अल्पसंख्यक शिक्षा की नई व्यवस्था में फंसा मिड-डे मील..
उत्तराखंड: उत्तराखंड में मदरसों की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के बाद वहां पढ़ने वाले बच्चों के सामने मिड-डे मील का संकट खड़ा हो गया है। राज्य में मदरसा बोर्ड की जगह अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की व्यवस्था लागू होने के बाद कई मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को मिलने वाली मध्याह्न भोजन की सुविधा प्रभावित हुई है। पहले मदरसा बोर्ड से पंजीकृत संस्थानों के बच्चों को शिक्षा विभाग की ओर से इस योजना का लाभ दिया जा रहा था, लेकिन नई व्यवस्था में पंजीकरण और पात्रता को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने से मामला अटका हुआ है।
नई व्यवस्था के बाद योजना पर लगा ब्रेक
राज्य में एक जुलाई से उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की व्यवस्था लागू की गई थी। इसके साथ ही पूर्व में संचालित मदरसा बोर्ड की व्यवस्था समाप्त कर दी गई। इसके बाद मदरसों को नए प्राधिकरण के तहत पंजीकरण कराने की प्रक्रिया शुरू हुई। हालांकि, इस बदलाव के बीच बच्चों को मिड-डे मील उपलब्ध कराने का मुद्दा अब तक स्पष्ट समाधान का इंतजार कर रहा है। प्राधिकरण की ओर से शिक्षा विभाग को कई बार पत्र भेजकर पात्र मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए भोजन की व्यवस्था जारी रखने का अनुरोध किया गया है। तर्क दिया गया है कि पहले इन संस्थानों के विद्यार्थियों को इस सुविधा का लाभ मिल रहा था, इसलिए नई व्यवस्था के तहत पंजीकृत होने वाले मदरसों के बच्चों के लिए भी इसका रास्ता निकाला जाना चाहिए।
452 मदरसों में से 245 बंद, पंजीकरण के आवेदन लंबित
राज्य में मदरसों की स्थिति भी नई व्यवस्था के बाद बदल गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कुल 452 मदरसों में से 245 बंद हो चुके हैं। वहीं, 17 मदरसों को सील किया गया है, जबकि एक संस्थान की ओर से पंजीकरण के लिए आवेदन नहीं किया गया है। करीब 130 मदरसों के पंजीकरण संबंधी आवेदन शिक्षा विभाग में लंबित बताए जा रहे हैं। ऐसे में संस्थानों के संचालन और बच्चों को मिलने वाली सुविधाओं को लेकर असमंजस बना हुआ है। पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी नहीं होने का असर मध्याह्न भोजन योजना पर भी पड़ रहा है।
पहले मदरसा बोर्ड से मान्यता प्राप्त संस्थानों को केंद्र सरकार के निर्देशों के आधार पर मिड-डे मील की सुविधा दी जा रही थी। नई व्यवस्था लागू होने के बाद इन संस्थानों की श्रेणी और योजना के तहत उनकी पात्रता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। शिक्षा विभाग का तर्क है कि नई व्यवस्था के तहत ये संस्थान निजी विद्यालयों की श्रेणी में आ गए हैं, ऐसे में इन्हें मिड-डे मील देने के लिए नियमों की स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है। दूसरी ओर, अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण चाहता है कि पात्र संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों को पहले की तरह भोजन की सुविधा मिल सके। इस मामले में शिक्षा विभाग और संबंधित अधिकारियों के बीच बातचीत के जरिए समाधान तलाशने की बात सामने आई है। जरूरत पड़ने पर केंद्र सरकार से भी दिशा-निर्देश मांगे जा सकते हैं, ताकि योजना के तहत पात्रता को लेकर स्थिति साफ हो सके। फिलहाल सबसे बड़ी चिंता उन बच्चों को लेकर है, जो इन संस्थानों में पढ़ते हैं और जिनके लिए मध्याह्न भोजन पोषण के साथ-साथ नियमित शिक्षा से जुड़ाव का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। अब देखना होगा कि शासन और शिक्षा विभाग इस मामले में कब तक निर्णय लेते हैं, जिससे पात्र बच्चों को योजना का लाभ मिल सके।

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