October 13, 2026

स्वर्ग से कम नहीं टिहरी का पवाली कांठा ट्रैक..

स्वर्ग से कम नहीं टिहरी का पवाली कांठा ट्रैक..

प्राकृतिक खूबसूरती के बावजूद नहीं मिल पाई खास पहचान..

 

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड के पहाड़ों में बसे खूबसूरत बुग्यालों को पर्यटन के नक्शे पर नई पहचान दिलाने की दिशा में पहल शुरू हो गई है। टिहरी गढ़वाल का पवाली कांठा–त्रियुगीनारायण ट्रैक अब स्थानीय पर्यटन और रोजगार का नया केंद्र बनने की उम्मीद जगा रहा है। इस क्षेत्र में ट्रैकिंग गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए घंटाकर्ण स्वयं सहायता समूह को 10 लाख रुपये की परियोजना सौंपी गई है। समूह को ट्रैक संचालन के लिए प्रशिक्षण भी दिया गया है और अब परियोजना शुरू करने की तैयारी है। इस पहल से पर्यटकों को हिमालय की खूबसूरती के बीच ट्रैकिंग और रात्रि विश्राम की सुविधा मिलेगी, वहीं स्थानीय लोगों के लिए कमाई के नए अवसर भी पैदा हो सकेंगे।

3,258 मीटर की ऊंचाई पर बसा है प्राकृतिक सौंदर्य का खजाना
समुद्र तल से लगभग 3,258 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पवाली कांठा और माटया बुग्याल का इलाका अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जाना जाता है। यहां दूर-दूर तक फैली हरी घास की चादर, ऊंची पर्वत चोटियां, ठंडी हवाएं और बादलों से ढके पहाड़ पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। टिहरी जिले के बूढ़ा केदार और घुत्तू क्षेत्र से होकर गुजरने वाला यह ट्रैक प्रकृति प्रेमियों और साहसिक पर्यटन के शौकीनों के लिए खास अनुभव दे सकता है। मौसम साफ रहने पर आसपास की पर्वत शृंखलाओं, गंगी क्षेत्र और सहस्रताल सहित हिमालय के कई मनोरम दृश्य देखने को मिलते हैं। खाटलिंग ग्लेशियर क्षेत्र की निकटता भी इस पूरे इलाके को ट्रैकिंग के लिहाज से खास बनाती है। हालांकि, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित सुविधाओं के कारण यह क्षेत्र अभी बड़े पर्यटन केंद्रों जैसी पहचान हासिल नहीं कर पाया है। पवाली कांठा की सबसे खास विशेषताओं में यहां का बदलता मौसम भी शामिल है। कभी घना कोहरा पूरे बुग्याल को अपने आगोश में ले लेता है, तो कभी बादल पहाड़ों की चोटियों के आसपास तैरते नजर आते हैं। साफ आसमान के दौरान हिमालयी नजारों का अलग ही आकर्षण देखने को मिलता है। यहां का शांत वातावरण और प्राकृतिक विविधता उन पर्यटकों को आकर्षित कर सकती है, जो भीड़भाड़ से दूर पहाड़ों के बीच समय बिताना चाहते हैं। ट्रैकिंग और हाई एल्टीट्यूड कैंपिंग के शौकीनों के लिए भी यह क्षेत्र संभावनाओं से भरा है। हालांकि, ऊंचाई और मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए यात्रियों के लिए सुरक्षा इंतजाम बेहद जरूरी हैं।

धार्मिक आस्था से भी जुड़ा है यह पैदल मार्ग
पवाली कांठा–त्रियुगीनारायण ट्रैक का महत्व केवल प्राकृतिक खूबसूरती तक सीमित नहीं है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस क्षेत्र के रास्ते प्राचीन समय में चारधाम यात्रा से जुड़ी पैदल यात्रा परंपराओं का हिस्सा रहे हैं। धार्मिक यात्रियों और कांवड़ यात्रियों की आवाजाही भी इस इलाके की पारंपरिक यात्रा संस्कृति से जुड़ी रही है। रास्ते में मौजूद काली कमली की धर्मशाला, वन विभाग के विश्राम स्थल और पशुपालकों की झोपड़ियां यात्रियों को ठहरने का सहारा देती हैं। वन गुर्जरों की डेयरियां और स्थानीय जीवनशैली यहां की पारंपरिक संस्कृति को करीब से समझने का अवसर भी देती हैं। बेहतर सुविधाएं विकसित होने पर धार्मिक यात्रा और साहसिक पर्यटन, दोनों को बढ़ावा मिल सकता है।

घंटाकर्ण स्वयं सहायता समूह संभालेगा ट्रैक संचालन
पवाली कांठा में पर्यटन गतिविधियों को व्यवस्थित रूप देने के लिए घंटाकर्ण स्वयं सहायता समूह को 10 लाख रुपये की परियोजना दी गई है। समूह के सदस्यों को ट्रैक संचालन से संबंधित प्रशिक्षण दिया गया है। अब इस परियोजना को शुरू किया जा रहा है, जिसके तहत पर्यटकों को ट्रैकिंग के लिए ले जाने और उनके रात्रि विश्राम की व्यवस्था करने की योजना है। वरुणा अग्रवाल के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य क्षेत्र में पर्यटन गतिविधियों को बढ़ाना और स्थानीय लोगों को रोजगार से जोड़ना है। स्वयं सहायता समूह की भागीदारी से पर्यटन संचालन में स्थानीय समुदाय की भूमिका मजबूत हो सकेगी। इससे ग्रामीण स्तर पर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।

गांव में ही रोजगार मिलने की बढ़ेगी संभावना
पवाली कांठा में पर्यटन को व्यवस्थित रूप से विकसित किया जाता है, तो स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के कई विकल्प खुल सकते हैं। पर्यटकों को ट्रैक पर ले जाने के लिए स्थानीय गाइड, सामान ढोने वाले पोर्टर, कैंपिंग और ठहरने की सुविधाओं से जुड़े काम शुरू हो सकते हैं। इसके साथ ही स्थानीय खाद्य पदार्थों, हस्तशिल्प और दूसरे ग्रामीण उत्पादों की बिक्री के अवसर भी बढ़ सकते हैं। पर्यटन से होने वाली आय गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मदद कर सकती है। स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ने से युवाओं को अपने क्षेत्र में ही काम मिलने की संभावना बनेगी। इससे रोजगार के लिए दूसरे शहरों की ओर होने वाले पलायन को कम करने में भी मदद मिल सकती है।

ट्रैक पर सुविधाएं बढ़ाना भी जरूरी
पर्यटन की संभावनाओं के बावजूद पवाली कांठा जैसे दुर्गम क्षेत्र में कई बुनियादी सुविधाओं की जरूरत है। पैदल रास्तों का सुधार, सुरक्षित ट्रैकिंग रूट, विश्राम स्थल, स्वच्छ पेयजल, शौचालय और प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था पर्यटकों के लिए महत्वपूर्ण होगी। रास्तों पर दिशा बताने वाले संकेतक, मौसम संबंधी चेतावनी और प्रशिक्षित स्थानीय गाइड की उपलब्धता भी सुरक्षा के लिहाज से जरूरी है। इसके अलावा, ट्रैक पर आने वाले यात्रियों को मौसम, ऊंचाई और रास्ते की कठिनाइयों के बारे में पहले से जानकारी देना भी महत्वपूर्ण होगा। उचित प्रबंधन के बिना पर्यटकों की संख्या बढ़ने से सुरक्षा और पर्यावरण संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। पवाली कांठा का प्राकृतिक पर्यावरण बेहद संवेदनशील है। यहां पर्यटन बढ़ाने के साथ बुग्यालों और स्थानीय जैव विविधता को सुरक्षित रखना भी जरूरी होगा। प्लास्टिक के इस्तेमाल पर नियंत्रण, कचरे का उचित निस्तारण, पर्यावरण के अनुकूल निर्माण और सीमित एवं जिम्मेदार पर्यटन को प्राथमिकता देनी होगी। स्थानीय समुदाय को पर्यटन प्रबंधन से जोड़ने और पर्यटकों को प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूक करने से इस क्षेत्र की खूबसूरती लंबे समय तक बरकरार रखी जा सकती है। पर्यटन विकास की योजनाओं में पर्यावरण संरक्षण को शामिल करना इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी प्राकृतिक विरासत के कारण पवाली कांठा पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता है।

टिहरी के पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान की उम्मीद
पवाली कांठा–त्रियुगीनारायण ट्रैक में प्राकृतिक सौंदर्य, धार्मिक परंपरा और साहसिक गतिविधियों को एक साथ जोड़ने की क्षमता है। घंटाकर्ण स्वयं सहायता समूह को दी गई 10 लाख रुपये की परियोजना से इस क्षेत्र में पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देने की पहल हुई है। अब परियोजना के संचालन, पर्यटकों को मिलने वाली सुविधाओं और स्थानीय लोगों की भागीदारी पर इसकी सफलता निर्भर करेगी। यदि बुनियादी सुविधाओं, सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देते हुए योजनाबद्ध तरीके से पर्यटन विकसित किया जाता है, तो पवाली कांठा आने वाले समय में टिहरी गढ़वाल के प्रमुख आकर्षणों में अपनी जगह बना सकता है। इससे न केवल हिमालय की इस प्राकृतिक धरोहर को व्यापक पहचान मिलेगी, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का रास्ता भी खुल सकता है।