कन्हैयालाल डंडरियाल पुरस्कार रद्द, प्रकाशन वर्ष बदलने के आरोप सही पाए गए..
उत्तराखंड: उत्तराखंड के साहित्यिक जगत में इन दिनों प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मान को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। राज्य के चर्चित कन्हैयालाल डंडरियाल पुरस्कार को निरस्त किए जाने के फैसले ने साहित्यिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली, पुरस्कार चयन प्रक्रिया और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस पूरे मामले के सामने आने के बाद साहित्यकारों और भाषा प्रेमियों के बीच बहस तेज हो गई है। उत्तराखंड भाषा संस्थान ने वर्ष 2025 के लिए घोषित कन्हैयालाल डंडरियाल पुरस्कार को निरस्त कर दिया है। यह पुरस्कार गढ़वाली काव्य संग्रह ‘कुरमुरी’ के लिए साहित्यकार ओम बधाणी को दिया गया था। संस्थान की ओर से की गई जांच में शिकायत के आरोप सही पाए जाने के बाद यह कार्रवाई की गई। मामले की पुष्टि करते हुए माया ढकरियाल ने कहा कि शिकायत मिलने के बाद पूरे प्रकरण की जांच कराई गई थी और जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
विवाद की शुरुआत दिल्ली निवासी संदीप गढ़वाली द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से हुई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि ओम बधाणी का गढ़वाली काव्य संग्रह ‘कुरमुरी’ पहले ही वर्ष 2013 में प्रकाशित हो चुका था, जबकि पुरस्कार के नियमों के अनुसार केवल वर्ष 2022 से 2024 के बीच प्रकाशित मौलिक गढ़वाली पद्य पुस्तकों को ही पात्र माना गया था। शिकायतकर्ता ने दावा किया कि पुस्तक का कवर पेज बदलकर और प्रकाशन वर्ष 2013 की जगह 2023 दर्शाकर उसे दोबारा प्रकाशित किया गया। बाद में उसी संशोधित संस्करण को पुरस्कार के लिए आवेदन में शामिल किया गया। शिकायत के समर्थन में दस्तावेज और प्रकाशन से जुड़े प्रमाण भी संस्थान को सौंपे गए थे।
मामले को गंभीर मानते हुए भाषा संस्थान ने साहित्यकार ओम बधाणी को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा। जवाब में उन्होंने इसे “अनजाने में हुई त्रुटि” बताया, लेकिन शिकायतकर्ता ने इसे जानबूझकर किया गया कदम बताते हुए सख्त कार्रवाई की मांग की। जांच पूरी होने के बाद संस्थान ने शिकायत को सही मानते हुए पुरस्कार निरस्त करने का निर्णय लिया। इसके बाद ओम बधाणी ने पुरस्कार की धनराशि और सम्मान पत्र संस्थान को लौटा दिए। इस घटनाक्रम के बाद राज्य के साहित्यिक जगत में हलचल तेज हो गई है। कई साहित्यकारों और सांस्कृतिक संगठनों ने पिछले वर्षों में दिए गए साहित्यिक पुरस्कारों की भी निष्पक्ष जांच कराने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि पुरस्कार चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और पात्रता की सख्त जांच सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि योग्य और मौलिक रचनाकारों को ही सम्मान मिल सके।
साहित्यकारों का मानना है कि इस तरह के विवाद साहित्यिक पुरस्कारों की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाते हैं। साथ ही उन लेखकों के मनोबल पर भी असर डालते हैं, जो वर्षों तक ईमानदारी और मौलिकता के साथ भाषा और साहित्य की सेवा में जुटे रहते हैं। कई बुद्धिजीवियों ने सुझाव दिया है कि भविष्य में पुरस्कार प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल और सत्यापन आधारित बनाया जाए, ताकि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी की संभावना खत्म हो सके। यह मामला अब केवल एक पुरस्कार विवाद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उत्तराखंड के साहित्यिक संस्थानों की पारदर्शिता, जवाबदेही और विश्वसनीयता पर भी बड़ा सवाल बनकर उभर रहा है।

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