March 11, 2026

मनरेगा के वादे अधूरे, उत्तराखंड में रोजगार अवधि रही बेहद कम..

मनरेगा के वादे अधूरे, उत्तराखंड में रोजगार अवधि रही बेहद कम..

 

 

उत्तराखंड: ग्रामीण आजीविका सुरक्षा की दृष्टि से देश की प्रमुख योजना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के उत्तराखंड में क्रियान्वयन को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में कई अहम तथ्य सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जहां योजना के तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को वर्ष में 100 दिनों के रोजगार की गारंटी दी गई है, वहीं अप्रैल 2019 से मार्च 2024 के बीच राज्य में औसतन प्रति वर्ष 6.54 लाख परिवारों को केवल 21 दिनों का ही रोजगार मिल सका। कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मनरेगा ग्रामीण परिवारों को मजदूरी आधारित रोजगार उपलब्ध कराकर उनकी आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करने की एक महत्वपूर्ण पहल है। उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां 66 प्रतिशत से अधिक आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है, यह योजना गरीबी उन्मूलन और ग्रामीण विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से पर्वतीय जिलों के लिए, जो भौगोलिक और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं, मनरेगा की भूमिका और भी अहम मानी जाती है।

रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2019 से मार्च 2024 की अवधि में राज्य को उपलब्ध कराई गई 3647.21 करोड़ रुपये की धनराशि में से 3638.95 करोड़ रुपये व्यय किए गए। इस खर्च के माध्यम से 27.04 लाख परिवारों को मजदूरी आधारित रोजगार उपलब्ध कराया गया। 2340.06 करोड़ रुपये के मजदूरी भुगतान के साथ कुल 11.56 करोड़ मानव दिवस सृजित किए गए, जो योजना के व्यापक दायरे को दर्शाते हैं। हालांकि वित्तीय प्रबंधन के स्तर पर गंभीर कमियां भी उजागर हुई हैं। कैग के अनुसार रोजगार गारंटी निधि समय पर जारी नहीं किए जाने के कारण राज्य पर 2.03 करोड़ रुपये की ब्याज देनदारी आ गई। इसके अलावा सामग्री मदों में 122.40 करोड़ रुपये की देनदारियां लंबित पाई गईं, जो वित्तीय अनुशासन पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। रिपोर्ट में योजना के क्रियान्वयन से जुड़ी प्रक्रियागत खामियों का भी उल्लेख किया गया है। दिशा-निर्देश जारी होने के बावजूद पात्र परिवारों की पहचान के लिए घर-घर सर्वेक्षण नहीं कराया गया। परीक्षण के दायरे में आई चयनित ग्राम पंचायतों में से किसी ने भी वर्ष 2019 से 2024 के बीच पात्र लाभार्थियों की पहचान के लिए सर्वे नहीं कराया। इससे जरूरतमंद परिवारों तक योजना का लाभ पहुंचने पर प्रभाव पड़ने की आशंका जताई गई है।

इसके अतिरिक्त जॉब कार्ड प्रबंधन में भी लापरवाही सामने आई है। कैग रिपोर्ट के अनुसार मनरेगा जॉब कार्ड श्रमिकों की पात्रता का मूल दस्तावेज है, लेकिन जांच में पाया गया कि 39 प्रतिशत जॉब कार्ड बिना फोटो के जारी किए गए थे, जो नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है। रिपोर्ट संकेत देती है कि योजना के व्यापक वित्तीय उपयोग के बावजूद रोजगार उपलब्धता, लाभार्थी पहचान और प्रशासनिक प्रबंधन के स्तर पर सुधार की आवश्यकता है, ताकि मनरेगा का वास्तविक लाभ ग्रामीण परिवारों तक प्रभावी रूप से पहुंच सके।