रुद्रप्रयाग की हेमा नेगी करासी को उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार की सौगात..
उत्तराखंड: उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने वाली प्रसिद्ध लोकगायिका हेमा नेगी करासी को वर्ष 2024-25 के प्रतिष्ठित ‘उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार’ से सम्मानित किए जाने की घोषणा हुई है। यह सम्मान देश की सर्वोच्च सांस्कृतिक संस्थाओं में से एक संगीत नाटक अकादमी द्वारा लोकसंगीत और लोकसंस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रदान किया जाएगा। इस घोषणा के बाद उत्तराखंड के सांस्कृतिक जगत में खुशी की लहर है। कलाकारों, साहित्यकारों और लोकसंस्कृति से जुड़े लोगों ने इसे पूरे प्रदेश के लिए गौरव का क्षण बताया है। माना जा रहा है कि यह सम्मान केवल एक कलाकार की उपलब्धि नहीं, बल्कि उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को मिला राष्ट्रीय सम्मान है।
हेमा नेगी करासी लंबे समय से उत्तराखंड की पारंपरिक लोक विधाओं को संरक्षित करने और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए कार्य कर रही हैं। उन्होंने अपने गायन के माध्यम से जागर, थड़िया, चौंफला, झुमेलो और अन्य पारंपरिक लोक कलाओं को नई पहचान दी है। उनके गीतों में पहाड़ की संस्कृति, लोकजीवन, परंपराएं और सामाजिक सरोकारों की झलक देखने को मिलती है। आधुनिक दौर में जब कई पारंपरिक विधाएं धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच रही थीं, तब हेमा नेगी करासी ने उन्हें मंचों और डिजिटल माध्यमों के जरिए नई ऊर्जा प्रदान की।
रुद्रप्रयाग जिले के तुखिंडा गांव में जन्मी हेमा नेगी करासी का जीवन संघर्ष और सफलता की प्रेरणादायक कहानी है। सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने अपनी कला साधना को जारी रखा और अनेक चुनौतियों का सामना करते हुए लोकसंगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। विवाह के बाद उनका संबंध रुद्रप्रयाग के फलासी गांव से जुड़ा। ग्रामीण परिवेश और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को नहीं छोड़ा और लोक संस्कृति के प्रचार-प्रसार को अपना मिशन बना लिया। हेमा नेगी करासी ने केवल लोकगीतों के माध्यम से ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पारंपरिक वेशभूषा को भी राष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने मंचों पर पाखला-आंगड़ी, पारंपरिक नथ और अन्य लोक परिधानों को गर्व के साथ धारण कर उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत किया। एक समय ऐसा भी था जब उनकी इस पहल का मजाक उड़ाया गया और उन्हें आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी संस्कृति और परंपराओं पर विश्वास बनाए रखा। आज वही पारंपरिक परिधान उत्तराखंड की पहचान के रूप में देश और विदेशों में सम्मान के साथ देखे जाते हैं।
लोक संस्कृति के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए हेमा नेगी करासी को पहले भी कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है। उन्हें उत्तराखंड सरकार के प्रतिष्ठित ‘तीलू रौतेली पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया जा चुका है। यह सम्मान समाज, संस्कृति और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उनके योगदान की पहचान माना जाता है। सांस्कृतिक विशेषज्ञों का मानना है कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार के लिए हेमा नेगी करासी का चयन उत्तराखंड की लोक परंपराओं को राष्ट्रीय स्तर पर मिली बड़ी पहचान है। यह सम्मान राज्य के युवा कलाकारों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनेगा और लोक संस्कृति के संरक्षण के प्रयासों को नई दिशा देगा। हेमा नेगी करासी की यह उपलब्धि एक बार फिर साबित करती है कि समर्पण, मेहनत और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संकल्प किसी भी कलाकार को राष्ट्रीय पहचान दिला सकता है। उनके सम्मानित होने से उत्तराखंड की लोक संस्कृति को नई ऊर्जा और नई पहचान मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

More Stories
निशानेबाजी के दिग्गज जसपाल राणा का निधन, खेल प्रेमियों में शोक की लहर..
राष्ट्रीय खेलों के खिलाड़ियों को आउट ऑफ टर्न नौकरी देने की राह हुई आसान..
मरीजों को मिलेंगी और सुरक्षित दवाएं, 1 जुलाई से लागू होंगे IP-2026 के नए मानक