July 21, 2026

राष्ट्रीय मंच पर गूंजा गढ़वाल, फिल्म ‘ढोली’ ने रचा नया इतिहास..

राष्ट्रीय मंच पर गूंजा गढ़वाल, फिल्म ‘ढोली’ ने रचा नया इतिहास..

 

उत्तराखंड: गढ़वाली सिनेमा के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है। पहली बार किसी गढ़वाली फीचर फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में ‘ढोली’ को फीचर फिल्म श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ गढ़वाली फिल्म का सम्मान मिला है। इस उपलब्धि ने न केवल गढ़वाली फिल्म उद्योग को राष्ट्रीय पहचान दिलाई है, बल्कि पूरे उत्तराखंड के लिए गर्व का अवसर भी प्रदान किया है। करीब 85 मिनट की यह फिल्म एक पारंपरिक ढोली (ढोल वादक) और उसके परिवार के जीवन, संघर्ष और सामाजिक परिस्थितियों पर आधारित है। कहानी उस विडंबना को सामने लाती है जिसमें समाज धार्मिक अनुष्ठानों, पर्व-त्योहारों और शुभ अवसरों पर ढोल-दमाऊ की धुन का सम्मान तो करता है, लेकिन इन्हें बजाने वाले कलाकारों को समान सामाजिक सम्मान और पहचान नहीं मिलती। फिल्म इसी सामाजिक सोच पर सवाल उठाते हुए संवेदनशील संदेश देती है।

लोक संस्कृति और गांव की आत्मा को पर्दे पर उतारा

‘ढोली’ केवल एक परिवार की कहानी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गढ़वाल की समृद्ध लोक संस्कृति, पारंपरिक जीवनशैली, गांवों की सादगी, रीति-रिवाज, लोक वाद्ययंत्र और स्थानीय बोली को बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। फिल्म उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को बड़े पर्दे के माध्यम से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाने का सफल प्रयास मानी जा रही है। फिल्म की शूटिंग उत्तरकाशी जिले की मनमोहक असीगंगा घाटी के नाल्ड गांव और आसपास के क्षेत्रों में की गई है। प्राकृतिक सुंदरता के साथ स्थानीय परिवेश को वास्तविक रूप में फिल्माया गया है। फिल्म में उत्तराखंड के कई स्थानीय कलाकारों ने अभिनय किया है, जिससे इसकी प्रस्तुति और भी जीवंत बन गई है।

नरेंद्र सिंह नेगी की आवाज़ ने बढ़ाया आकर्षण

फिल्म के गीतों को उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी ने अपनी आवाज़ दी है। उनके गीत फिल्म की भावनाओं और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को और अधिक प्रभावशाली बनाते हैं। संगीत और लोकधुनों के माध्यम से फिल्म गढ़वाल की सांस्कृतिक पहचान को मजबूती से प्रस्तुत करती है। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलने से पहले भी ‘ढोली’ को देश के प्रतिष्ठित फिल्म समारोहों में सराहना मिल चुकी है। वर्ष 2024 में यह कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित होने वाली उत्तराखंड की एकमात्र फिल्म थी। वहां दर्शकों और फिल्म समीक्षकों ने इसकी कहानी, निर्देशन और सांस्कृतिक प्रस्तुति की काफी प्रशंसा की थी।

गढ़वाली सिनेमा के लिए नया दौर

‘ढोली’ को मिला राष्ट्रीय सम्मान गढ़वाली सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है। लंबे समय से सीमित संसाधनों में काम कर रहे क्षेत्रीय फिल्म उद्योग को इससे नई पहचान और प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है। साथ ही उत्तराखंड के लोक कलाकारों, लोक संगीत और पारंपरिक संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलने का रास्ता भी मजबूत हुआ है। फिल्म की इस सफलता ने यह साबित किया है कि स्थानीय कहानियां, लोक संस्कृति और सामाजिक सरोकारों पर आधारित सिनेमा भी राष्ट्रीय मंच पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा सकता है। ‘ढोली’ अब केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत, लोक कलाकारों के सम्मान और गढ़वाली सिनेमा की नई पहचान का प्रतीक बन चुकी है।