राज्यपाल ने किया अंतरराष्ट्रीय साहित्य महोत्सव का उद्घाटन, दुनियाभर के रचनाकार जुटे..
उत्तराखंड: साहित्य, कला और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने के उद्देश्य से देश के पहले लेखक गांव में अंतरराष्ट्रीय महोत्सव शुरू हो गया है। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। आयोजन में 60 देशों सहित भारत के विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकारों, कवियों, शिक्षाविदों, कलाकारों और विद्यार्थियों की भागीदारी देखने को मिली। महोत्सव के उद्घाटन सत्र में भारतीय ज्ञान परंपरा, साहित्य की प्रासंगिकता और विश्व स्तर पर सांस्कृतिक सहयोग बढ़ाने जैसे विषय प्रमुख रहे। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि साहित्य समाज को दिशा देने और लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का प्रभावी माध्यम है। ऐसे आयोजन अलग-अलग देशों की भाषाओं, परंपराओं और विचारों को एक मंच पर लाकर आपसी समझ को मजबूत करने में मदद करते हैं।
राज्यपाल बोले, नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने में साहित्य की अहम भूमिका
राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने लेखक गांव को साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण पहल बताते हुए इसकी परिकल्पना की प्रशंसा की। उन्होंने डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि उत्तराखंड की पहचान प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ इसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, वीरता और राष्ट्रसेवा की परंपरा से भी जुड़ी है। उन्होंने कहा कि देश की आजादी के आंदोलन में साहित्य ने लोगों को जागरूक करने और राष्ट्रीय भावना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। वर्तमान समय में भी लेखकों की जिम्मेदारी है कि वे अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक संवेदनशीलता, आपसी सद्भाव और देश के प्रति कर्तव्य की भावना को प्रोत्साहित करें। राज्यपाल ने साहित्यकारों से अपील की कि वे बच्चों और युवाओं को भारतीय परंपराओं, जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने में अपनी भूमिका निभाएं। शरद पूर्णिमा की शुभकामनाएं देते हुए उन्होंने समाज में ज्ञान और सकारात्मकता के प्रसार की कामना की।
उत्तराखंड की लोकभाषाओं को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मिले पहचान
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री सतपाल महाराज ने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में शांति और मानवीय मूल्यों का संदेश देना बेहद जरूरी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि हिमालय की गोद में विकसित लेखक गांव साहित्यिक संवाद, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सद्भाव का प्रमुख केंद्र बनेगा। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड आने वाले लोगों को धार्मिक स्थलों के साथ यहां की साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपराओं से भी जुड़ना चाहिए। मंत्री ने गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी भाषाओं को व्यापक मंच उपलब्ध कराने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि स्थानीय भाषाओं को प्रोत्साहन मिलने से प्रदेश की लोकसंस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिल सकती है। मॉरीशस के पूर्व राष्ट्रपति पृथ्वीराज सिंह रूपन ने लेखक गांव को रचनात्मक गतिविधियों के विस्तार के लिए उपयोगी मंच बताया। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन विभिन्न देशों के रचनाकारों को एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने और युवाओं को साहित्य एवं कला के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर देते हैं।
ज्ञान परंपरा और रचनाकारों के संरक्षण पर जोर
रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलाधिपति संतोष चौबे ने लेखक गांव को विचारों और साहित्यिक सृजन का ऐसा केंद्र बनाने की आवश्यकता बताई, जहां से ज्ञान का प्रसार व्यापक स्तर पर हो सके। परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि समय के साथ शासन व्यवस्थाएं बदलती रहती हैं, लेकिन किसी राष्ट्र की पहचान उसकी सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान परंपरा से बनी रहती है। इसलिए साहित्यकारों और ज्ञान की परंपरा को संरक्षित करना आवश्यक है। उन्होंने लेखक गांव की स्थापना के विचार को महत्वपूर्ण बताते हुए इसे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सपनों से जुड़ी पहल बताया।
पुस्तकों और रचनात्मक कार्यों से बनेगी लेखक गांव की पहचान
प्रसिद्ध प्रवासी कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने लेखक गांव की अब तक की यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी साहित्यिक केंद्र की वास्तविक पहचान वहां तैयार होने वाली रचनाओं और पाठकों तक पहुंचने वाली पुस्तकों से बनती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि लेखक गांव ऐसा वातावरण तैयार करेगा, जहां साहित्यकारों को स्वतंत्र रूप से सृजन करने का अवसर मिलेगा और उनकी कृतियां अधिक से अधिक पाठकों तक पहुंच सकेंगी। इससे भारतीय साहित्य को वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
लेखक गांव को भारतीय ज्ञान और संस्कृति का केंद्र बनाने की योजना
महोत्सव के अध्यक्षीय संबोधन में पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने कार्यक्रम में शामिल राज्यपाल, संतों, साहित्यकारों, शिक्षाविदों, कलाकारों और विदेशी प्रतिनिधियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने राज्यपाल के साथ संसद में बिताए समय को याद करते हुए उनके सामाजिक सरोकारों और जनसेवा के प्रति समर्पण का उल्लेख किया। डॉ. निशंक ने कहा कि लेखक गांव की अवधारणा का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करना है। उन्होंने कहा कि हिमालय की धरती प्राचीन समय से ऋषियों, मनीषियों और साधकों की तपस्थली रही है। लेखक गांव इसी परंपरा को वर्तमान समय के अनुरूप आगे बढ़ाने का प्रयास है, जहां साहित्य, कला, संस्कृति और ज्ञान से जुड़े लोगों को एक साझा मंच मिल सके। महोत्सव में देश-विदेश से आए प्रतिभागियों की मौजूदगी से विभिन्न भाषाओं, साहित्यिक परंपराओं और सांस्कृतिक विचारों के बीच संवाद को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। आयोजन का उद्देश्य रचनात्मक सहयोग के नए अवसर तैयार करना और भारतीय सांस्कृतिक विरासत को व्यापक पहचान दिलाना है।

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