केदारनाथ धाम में सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन, अन्नकूट मेले को लेकर तैयारियां शुरू..
उत्तराखंड: विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ धाम में रक्षाबंधन से एक दिन पूर्व आयोजित होने वाले पारंपरिक अन्नकूट मेले को लेकर केदारनाथ धाम तीर्थ पुरोहितों द्वारा तैयारियां शुरू कर दी गई है। सदियों पुरानी इस धार्मिक परंपरा के तहत मध्यरात्रि में भगवान केदारनाथ के स्वयंभू शिवलिंग की विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी। इसके बाद नए अनाज से बाबा केदार का विशेष श्रृंगार किया जाएगा। इस अद्भुत धार्मिक आयोजन के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा के धाम पहुंच जाते है। केदारनाथ धाम में अन्नकूट मेले को स्थानीय भाषा में भतूज मेला भी कहा जाता है। यह आयोजन हर वर्ष रक्षाबंधन से ठीक एक दिन पहले किया जाता है। इस दौरान मंदिर के गर्भगृह में विशेष धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होते हैं और भगवान शिव को नए अनाज का भोग अर्पित किया जाता है। मान्यता है कि नए अनाज में मौजूद विषैले तत्वों को भगवान भोलेनाथ स्वयं ग्रहण कर भक्तों और क्षेत्र की रक्षा करते हैं।
मध्यरात्रि से शुरू होगी विशेष पूजा
अन्नकूट मेले की धार्मिक प्रक्रिया रात से ही शुरू हो जाती है। केदारनाथ मंदिर के तीर्थ पुरोहितों की ओर से भगवान के स्वयंभू शिवलिंग की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद झंगोरा, चावल, कौंणी सहित विभिन्न नए अनाज से तैयार लेप शिवलिंग पर लगाया जाता है। नए अनाज के लेप से भगवान केदारनाथ का किया जाने वाला श्रृंगार बेहद विशेष माना जाता है। धार्मिक अनुष्ठान पूरा होने के बाद श्रद्धालुओं को सजे हुए शिवलिंग के दर्शन का अवसर मिलता है। इस दौरान मंदिर का वातावरण पूरी तरह शिवमय हो जाता है और बाबा केदार के जयकारों से धाम गूंज उठता है। अन्नकूट मेले की सबसे खास बात यह है कि इस अवसर पर केदारनाथ मंदिर के कपाट रातभर खुले रहते हैं। मध्यरात्रि में पूजा और श्रृंगार की प्रक्रिया पूरी होने के बाद श्रद्धालु सुबह करीब चार बजे तक विशेष श्रृंगार किए गए स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन कर सकते हैं। सामान्य दिनों की तुलना में यह आयोजन अपने धार्मिक स्वरूप और विशेष परंपराओं के कारण अलग महत्व रखता है। देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले श्रद्धालु इस अनूठे दर्शन को करने के लिए उत्सुक रहते हैं।
अगले दिन मंदाकिनी में प्रवाहित किया जाता है अनाज का लेप
अन्नकूट मेले की धार्मिक प्रक्रिया अगले दिन भी जारी रहती है। विशेष पूजा के दौरान भगवान को लगाए गए नए अनाज के लेप को अगले दिन मंदिर से हटाया जाता है। इसके बाद इसे मंदाकिनी नदी में विधि-विधान के साथ प्रवाहित किया जाता है। मंदिर की सफाई के बाद भगवान केदारनाथ की नियमित पूजा-अर्चना शुरू होती है। तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, इस परंपरा का उद्देश्य प्रकृति और भगवान शिव के प्रति आस्था को जोड़ना भी है। नए अन्न को भगवान को समर्पित करने के बाद ही उसके उपयोग की परंपरा से इस पर्व का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। अन्नकूट या भतूज मेले की यह परंपरा केवल केदारनाथ तक सीमित नहीं है। केदार घाटी के अन्य प्रमुख शिव मंदिरों में भी इस अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। गुप्तकाशी स्थित विश्वनाथ मंदिर और ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर सहित कई शिवालयों में नए अनाज का भोग भगवान को अर्पित किया जाता है। स्थानीय लोगों के लिए यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोक परंपरा और संस्कृति से भी जुड़ा हुआ है। नई फसल के अनाज को सबसे पहले भगवान को अर्पित करने की परंपरा पहाड़ की संस्कृति में लंबे समय से चली आ रही है।
अनोखी परंपरा के कारण खास है केदारनाथ का अन्नकूट मेला
केदारनाथ धाम भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल है और यहां आयोजित होने वाला अन्नकूट मेला अपनी विशिष्ट धार्मिक परंपरा के लिए विशेष पहचान रखता है। मेले के दौरान रात में मंदिर के कपाट खुले रहना और स्वयंभू शिवलिंग का नए अनाज से श्रृंगार किया जाना इस आयोजन को बेहद खास बनाता है।रक्षाबंधन से पहले होने वाले इस आयोजन को लेकर तीर्थ पुरोहितों और स्थानीय लोगों में उत्साह है। मंदिर परिसर में धार्मिक तैयारियों के साथ व्यवस्थाओं को भी अंतिम रूप दिया जा रहा है, ताकि श्रद्धालु शांतिपूर्वक बाबा केदार के विशेष दर्शन कर सकें। श्रद्धालुओं के लिए अन्नकूट मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही आस्था, लोक संस्कृति और भगवान शिव के प्रति समर्पण की जीवंत परंपरा है। बाबा केदार के विशेष श्रृंगार के दर्शन को श्रद्धालु अपने लिए सौभाग्य और आशीर्वाद का अवसर मानते हैं।

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