August 18, 2026

मखमली बुग्याल में गूंजे ढोल-दमाऊं, दूध-मक्खन से खेली गई अनोखी होली..

मखमली बुग्याल में गूंजे ढोल-दमाऊं, दूध-मक्खन से खेली गई अनोखी होली..

 

उत्तराखंड: समुद्रतल से करीब 11 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित उत्तरकाशी का प्रसिद्ध दयारा बुग्याल सोमवार को लोक आस्था, परंपरा और संस्कृति के अनूठे संगम का गवाह बना। यहां पारंपरिक अंढूड़ी पर्व यानी बटर फेस्टिवल पूरे उत्साह और उल्लास के साथ मनाया गया। देवडोली की मौजूदगी में आयोजित इस पारंपरिक उत्सव में ग्रामीणों और श्रद्धालुओं ने रंग-गुलाल की जगह दूध, दही और मक्खन से एक-दूसरे को रंगकर अनूठी होली खेली। सुबह से ही दयारा बुग्याल की ओर ग्रामीणों और श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। पंचगाई पट्टी के रैथल, नटीण, बंद्राणी, क्यार्क और भटवाड़ी गांवों से ग्रामीण अपने आराध्य समेश्वर देवता की देवडोली के साथ बुग्याल पहुंचे। आसपास के अन्य क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग इस पारंपरिक पर्व में शामिल होने पहुंचे।

देवडोली के साथ शुरू हुए धार्मिक अनुष्ठान

अंढूड़ी पर्व को लेकर स्थानीय लोगों में विशेष आस्था है। मान्यता के अनुसार पर्व की शुरुआत पांच पांडवों के पश्वाओं के अवतरित होने से हुई। इसके बाद समेश्वर देवता की देवडोली के साथ उनके पश्वा भी अवतरित हुए। धार्मिक परंपरा के अनुसार समेश्वर देवता ने कफुवा पर डांगरियों के बीच पहुंचकर मेलार्थियों को आशीर्वाद दिया। देवता के दर्शन और आशीर्वाद के बाद बुग्याल में बने पारंपरिक छानियों में ग्रामीणों द्वारा एकत्र किए गए दूध, दही और मक्खन को वन देवताओं और स्थानीय देवी-देवताओं को अर्पित किया गया। पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान के बाद पर्व के मुख्य आयोजन की शुरुआत हुई।अंढूड़ी पर्व का सबसे खास आकर्षण मक्खन से भरी हांडी फोड़ने की परंपरा रही। धार्मिक अनुष्ठान के बाद राधा-कृष्ण की जोड़ी ने मक्खन से भरी हांडी फोड़ी। हांडी टूटते ही पूरा बुग्याल उत्सव के रंग में डूब गया। इसके बाद ग्रामीणों ने एक-दूसरे पर दूध, दही और मक्खन लगाकर पारंपरिक तरीके से होली खेली। चारों तरफ लोगों के चेहरे और कपड़े दूध-दही और मक्खन से सराबोर नजर आए। इस अनूठी होली ने दयारा बुग्याल के प्राकृतिक वातावरण को उत्सव के रंग में रंग दिया।

रासौ-तांदी ने बांधा समां

उत्सव के दौरान पारंपरिक लोक संस्कृति की भी शानदार झलक देखने को मिली। महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में राधा-कृष्ण की जोड़ी के साथ रासौ-तांदी नृत्य प्रस्तुत किया। पुरुषों ने भी लोकनृत्य में उत्साहपूर्वक भाग लिया। ढोल-दमाऊं की थाप और पारंपरिक लोकगीतों की गूंज के बीच ग्रामीण देर तक नाचते-गाते रहे। देवभूमि की लोक संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से जुड़े इस आयोजन ने वहां मौजूद लोगों को उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से रूबरू कराया।अंढूड़ी पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि दयारा बुग्याल और आसपास के गांवों की सदियों पुरानी लोक आस्था और सामुदायिक परंपराओं का प्रतीक माना जाता है। पर्व के दौरान ग्रामीण अपने आराध्य देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के साथ सामूहिक रूप से अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी आगे बढ़ाते हैं।

स्थानीय लोगों के लिए यह आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, लोक मान्यताओं और पारंपरिक जीवनशैली से जोड़ने का अवसर भी बनता है। यही वजह है कि हर वर्ष अंढूड़ी पर्व को लेकर ग्रामीणों और श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखने को मिलता है। दयारा पर्यटन विकास समिति की देखरेख में हुए आयोजन में समिति के अध्यक्ष मनोज राणा सहित पृथ्वीराज राणा, किशन सिंह, बचन सिंह, सुंदर सिंह, बुद्धी लाल, मोहन लाल, बलवंत राणा, राजकेंद्र सिंह, सुरेश रतोड़ी और यशवंत समेत बड़ी संख्या में ग्रामीण एवं श्रद्धालु मौजूद रहे। ऊंचाई पर बसे दयारा बुग्याल में मनाया गया यह पारंपरिक पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ उत्तराखंड की लोक संस्कृति और सामुदायिक जीवन की जीवंत तस्वीर पेश करता नजर आया। दूध, दही और मक्खन से खेली गई होली तथा ढोल-दमाऊं की थाप पर हुए लोकनृत्य ने पूरे आयोजन को यादगार बना दिया।