छह साल बाद खुलेगा लिपुलेख रास्ता, व्यापार के साथ रिश्तों को भी मिलेगी नई दिशा..
उत्तराखंड: उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित लिपुलेख दर्रे से भारत और चीन के बीच सीमापार व्यापार एक बार फिर शुरू होने की संभावना तेज हो गई है। सूत्रों के अनुसार, आगामी जून माह से इस पारंपरिक व्यापार को पुनः प्रारंभ किया जा सकता है, जिससे दोनों देशों के सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ मिलने की उम्मीद है।
बता दे कि लिपुलेख दर्रे के माध्यम से भारत और तिब्बत (चीन) के बीच दशकों से स्थानीय स्तर पर व्यापार होता रहा है। हालांकि, कोविड-19 महामारी और उसके बाद भारत-चीन के बीच उत्पन्न तनावपूर्ण परिस्थितियों के चलते पिछले करीब छह वर्षों से यह व्यापार पूरी तरह ठप पड़ा हुआ था। अब हालात में सुधार के संकेतों के बीच इसे दोबारा शुरू करने की तैयारी की जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान वैश्विक और क्षेत्रीय भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत और चीन दोनों ही अपने द्विपक्षीय संबंधों में संतुलन और स्थिरता लाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। ऐसे में लिपुलेख दर्रे से होने वाला यह सीमित लेकिन महत्वपूर्ण व्यापार दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली में अहम भूमिका निभा सकता है। हालांकि आर्थिक दृष्टि से इस व्यापार का दायरा अभी अपेक्षाकृत छोटा रहा है। पूर्व में यहां सालाना दो से पांच करोड़ रुपये तक का लेनदेन होता था, लेकिन विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि इसकी पूरी क्षमता का उपयोग किया जाए, तो यह व्यापार सौ करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
इस व्यापार का सबसे बड़ा लाभ सीमावर्ती गांवों में रहने वाले लोगों को मिलता है। उत्तराखंड के स्थानीय व्यापारी और किसान इस मार्ग से कपड़े, खाद्य तेल, घी, मसाले और अनाज जैसी वस्तुओं का निर्यात करते हैं। वहीं, तिब्बती क्षेत्रों से ऊन, कच्चा रेशम, छिर्बी (पारंपरिक पशु उत्पाद) और सुहागा जैसी वस्तुओं का आयात किया जाता है। लिपुलेख दर्रे से व्यापार की बहाली न केवल आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देगी, बल्कि सीमावर्ती समुदायों के बीच आपसी संपर्क और सहयोग को भी मजबूती प्रदान करेगी। इसके साथ ही यह पहल भारत-चीन संबंधों में नई सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

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