February 11, 2026

दुर्गम ढलान बनी जानलेवा, घास काटते समय महिला की खाई में गिरकर मौत..

दुर्गम ढलान बनी जानलेवा, घास काटते समय महिला की खाई में गिरकर मौत..

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी ग्रामीण जीवन का बड़ा आधार महिलाओं के श्रम पर टिका हुआ है। घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ-साथ पशुओं के लिए घास-चारा, जंगल से पत्ती और जलावन लकड़ी लाना उनकी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा है। सुबह की पहली किरण के साथ महिलाएं टोकरी और दरांती लेकर जंगलों की ओर निकल पड़ती हैं। यह कार्य केवल परंपरा नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जीवनयापन की अनिवार्य आवश्यकता है। हालांकि पहाड़ का यह जीवन जितना प्राकृतिक सौंदर्य से भरा है, उतना ही जोखिमों से भी घिरा हुआ है। दुर्गम पगडंडियां, खड़ी ढलानें, ढीली मिट्टी, फिसलन भरे रास्ते और गहरी खाइयां हर कदम पर खतरे की आशंका बढ़ा देती हैं। बरसात और सर्दियों के मौसम में यह जोखिम कई गुना बढ़ जाता है, जब जमीन गीली और पथरीली हो जाती है। एक छोटा सा कदम फिसलना भी गंभीर हादसे में बदल सकता है।

पर्वतीय क्षेत्रों में अक्सर ऐसी दुखद घटनाएं सामने आती हैं, जब घास या लकड़ी लेने गई महिलाएं खाई में गिर जाती हैं या चट्टानों से लुढ़क जाती हैं। कई बार समय पर सहायता नहीं मिल पाने के कारण जान तक चली जाती है। ऐसी ही घटना रुद्रप्रयाग जिले के रामपुर से भी सामने आयी हैं। जहां पहाड़ी ढलान पर घास काटने गई एक महिला की खाई में गिरने से मौत हो गई। घटना के बाद क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। जानकारी के अनुसार न्यालसू गांव निवासी गीता देवी (पत्नी गजपाल सिंह) मंगलवार सुबह रोजमर्रा की तरह पशुओं के लिए घास लेने पहाड़ी ढलान की ओर गई थीं। इसी दौरान अचानक उनका संतुलन बिगड़ गया और पांव फिसलने से वह गहरी खाई में जा गिरीं। हादसा इतना गंभीर था कि महिला को संभलने का कोई मौका नहीं मिल सका।

घटना की सूचना मिलते ही पुलिस नियंत्रण कक्ष सक्रिय हुआ और तत्काल एसडीआरएफ की टीम को मौके के लिए रवाना किया गया। स्थानीय ग्रामीण भी बचाव कार्य में जुट गए। संयुक्त प्रयासों से महिला को खाई से बाहर निकाला गया, लेकिन तब तक उनकी मृत्यु हो चुकी थी। जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी नंदन रजवार ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि मृतका की पहचान गीता देवी के रूप में हुई है। उन्होंने कहा कि आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी की जा रही है। हादसे के बाद शव को निजी वाहन से जिला चिकित्सालय रुद्रप्रयाग भेजा गया, जहां पोस्टमार्टम की प्रक्रिया संपन्न कर शव परिजनों को सौंप दिया जाएगा। इस घटना से परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है, वहीं गांव में भी मातम का माहौल है। पर्वतीय क्षेत्रों में रोजमर्रा के कार्यों के दौरान इस तरह की दुर्घटनाएं चिंता का विषय बनी हुई हैं। खड़ी ढलानों और असुरक्षित मार्गों पर घास व लकड़ी लेने जाने वाली महिलाओं के लिए जोखिम लगातार बना रहता है। स्थानीय लोगों ने प्रशासन से ऐसे क्षेत्रों में सुरक्षा उपायों को और सुदृढ़ करने की मांग की है।

यदि ग्रामीण क्षेत्रों में चारा बैंक, घास उत्पादन योजनाएं, गैस कनेक्शन और सुरक्षित सामुदायिक वन मार्ग विकसित किए जाएं तो इस तरह की दुर्घटनाओं में कमी लाई जा सकती है। साथ ही जागरूकता और सुरक्षा प्रशिक्षण भी बेहद जरूरी है, ताकि महिलाएं जोखिम भरे स्थानों से बच सकें। उत्तराखंड की पहाड़ी महिलाएं संघर्ष और साहस की प्रतीक हैं, लेकिन उनके इस संघर्ष को सुरक्षित बनाना समाज और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी है। जब तक मूलभूत सुविधाएं और सुरक्षित विकल्प उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक जंगल की ओर जाने वाली हर सुबह उनके लिए संभावित खतरे से भरी रहेगी। इन हादसों के पीछे केवल भौगोलिक कठिनाइयां ही नहीं, बल्कि बुनियादी सुविधाओं की कमी भी एक बड़ा कारण है। गांवों में चारे के वैकल्पिक स्रोत, ईंधन के सुरक्षित साधन और आसान पहुंच वाले रास्तों का अभाव महिलाओं को जोखिम भरे इलाकों में जाने के लिए मजबूर करता है।