विकास के दावों पर सवाल, कई किमी पैदल चलकर बुजुर्ग को डोली से पहुंचाया अस्पताल..
उत्तराखंड: सरकार भले ही हर मंच से यह दावा करती हो कि सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं अब प्रदेश के अंतिम छोर तक पहुंच चुकी हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से कोसों दूर नजर आती है। विकास के चमकदार आंकड़ों और योजनाओं के शोर के बीच प्रदेश के कई दूरस्थ और दुर्गम गांव आज भी बुनियादी जरूरतों से वंचित हैं। इन गांवों में रहने वाले लोग रोजमर्रा की जिंदगी जीने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं, जहां एक बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाना चुनौती बन जाता है और बच्चों की पढ़ाई तथा इलाज जैसी जरूरी बातें भी किस्मत के भरोसे छोड़ दी जाती हैं।
हर चुनाव से पहले ग्रामीण इलाकों में विकास के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। सड़क, अस्पताल, स्कूल और संचार सुविधाओं को प्राथमिकता देने की बात कही जाती है। जनप्रतिनिधि गांव-गांव पहुंचकर भरोसा दिलाते हैं कि अब किसी भी ग्रामीण को बुनियादी सुविधाओं के अभाव में परेशान नहीं होना पड़ेगा। लेकिन चुनाव संपन्न होते ही ये वादे धीरे-धीरे कागजों और भाषणों तक सिमट कर रह जाते हैं। सत्ता में आने के बाद जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं से दूरस्थ गांव बाहर हो जाते हैं और उनकी समस्याएं वर्षों तक जस की तस बनी रहती हैं। प्रदेश के सीमांत और पहाड़ी इलाकों में आज भी ऐसे गांव मौजूद हैं, जहां सड़क न होने के कारण मरीजों को डोली के सहारे मुख्य मार्ग तक पहुंचाना पड़ता है। कई जगह मोबाइल नेटवर्क तक उपलब्ध नहीं है, जिससे आपात स्थिति में एंबुलेंस या स्वास्थ्य सेवाओं से संपर्क भी संभव नहीं हो पाता। यह हालात उस दौर में देखने को मिल रहे हैं, जब सरकार डिजिटल इंडिया और आधुनिक बुनियादी ढांचे की बात कर रही है।
दूरस्थ गांवों की यह स्थिति केवल विकास की असमानता को ही उजागर नहीं करती, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करती है कि आखिर सरकारी योजनाएं किसके लिए बनाई जा रही हैं। जब तक विकास योजनाएं कागजों से निकलकर जमीनी स्तर तक नहीं पहुंचेंगी, तब तक ऐसे गांवों के लिए विकास केवल एक नारा बनकर ही रह जाएगा। ग्रामीणों की नजरें आज भी उस दिन पर टिकी हैं, जब उनके गांव तक सड़क पहुंचेगी, अस्पताल और स्कूल की सुविधा मिलेगी और उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ेगा।
बागेश्वर जिले के दूरस्थ इलाकों की स्थिति इस सच्चाई को उजागर करने के लिए काफी है। जिले का हिरमोली गांव आज भी सड़क, स्वास्थ्य और संचार सुविधाओं से पूरी तरह महरूम है। हाल ही में यहां एक ऐसी घटना सामने आई, जिसने सरकारी दावों की पोल खोलकर रख दी। गांव में सड़क न होने के कारण 72 वर्षीय सेवानिवृत्त कैप्टन आनंद बल्लभ जोशी को इलाज के लिए डोली के सहारे मुख्य मार्ग तक पहुंचाना पड़ा। हिरमोली गांव में वर्तमान में करीब एक दर्जन परिवार रहते हैं। आजादी के इतने दशकों बाद भी इस गांव में सड़क नहीं पहुंच पाई है। यह गांव इस बात का उदाहरण है कि दुर्गम क्षेत्रों में आज भी मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए डोली ही एकमात्र सहारा बनती है। परिजनों ने बताया कि सेवानिवृत्त कैप्टन आनंद बल्लभ जोशी हल्द्वानी से गांव लौटे थे, जहां अचानक उन्हें तेज बुखार की शिकायत हुई। रात के समय तबीयत अधिक बिगड़ गई, लेकिन सड़क और संचार सुविधा न होने के कारण चाहकर भी उन्हें तत्काल अस्पताल नहीं ले जाया जा सका।
स्थिति और गंभीर तब हो गई, जब गांव में मोबाइल नेटवर्क न होने के कारण आपातकालीन सेवा 108 से भी संपर्क नहीं हो पाया। पूरी रात परिजन असहाय बने रहे। सुबह होते ही गांव के ग्रामीण एकजुट हुए और मानवता की मिसाल पेश करते हुए डोली तैयार की। ग्रामीण पूरन चंद्र जोशी, बसंत वल्लभ, प्रकाश चंद, हीरा सिंह, ललित सिंह और लाल सिंह ने सामूहिक रूप से साढ़े तीन किलोमीटर की दुर्गम चढ़ाई-ढलान और खतरनाक गदेरे को पार करते हुए बुजुर्ग को किसी तरह सड़क तक पहुंचाया। इसके बाद निजी वाहन से उन्हें बागेश्वर जिला अस्पताल ले जाया गया। ग्रामीणों का कहना है कि हिरमोली गांव की यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी कई बार मरीजों को इसी तरह जान जोखिम में डालकर डोली से सड़क तक लाना पड़ा है। गांव के लोगों ने बताया कि कौलाग, गाजली और तुपेड़ मोटरमार्ग की मांग वे वर्षों से करते आ रहे हैं। ग्रामीण हरगोविंद जोशी ने कहा कि पूर्व में कांग्रेस सरकार के समय इस सड़क को लेकर स्वीकृति की बातें हुई थीं, लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद यह योजना फाइलों में ही दबकर रह गई।
इस संबंध में लोक निर्माण विभाग कपकोट के अधिशासी अभियंता अमित कुमार पटेल ने बताया कि करूली बैंड से गांजली तक प्रस्तावित सड़क का करीब पांच किलोमीटर निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। शेष पांच किलोमीटर हिस्से के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया है। स्वीकृति मिलते ही प्राथमिकता के आधार पर सड़क निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा। वहीं ग्रामीणों का कहना है कि केवल आश्वासनों से अब उनका भरोसा टूट चुका है। यदि जल्द ही सड़क निर्माण कार्य शुरू नहीं किया गया, तो वे उग्र आंदोलन के लिए मजबूर होंगे। हिरमोली गांव की यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि आखिर कब तक दुर्गम गांवों के लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करते रहेंगे और कब सरकारी योजनाएं कागजों से निकलकर जमीन पर उतरेंगी।

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