पाइंता पर्व पर निभाई गई अनोखी रस्म..
उत्तराखंड: उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र में लोक संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराएं आज भी लोगों को अपनी विरासत से जोड़े हुए हैं। इसी सांस्कृतिक धरोहर की झलक मंगलवार को कालसी ब्लॉक के उदपाल्टा और कुरौली गांवों में देखने को मिली। यहां पाइंता पर्व के अवसर पर ग्रामीणों ने पारंपरिक गागली युद्ध का आयोजन किया। अरबी के डंठलों से खेले जाने वाले इस अनूठे आयोजन का उद्देश्य हार-जीत नहीं, बल्कि एक पुरानी दुखद घटना से जुड़ी मान्यता के अनुसार पश्चाताप और आपसी सद्भाव का संदेश देना है।
ढोल-नगाड़ों की थाप पर क्याणी पहुंचे ग्रामीण
पर्व के अवसर पर दोनों गांवों के बुजुर्गों, युवाओं और महिलाओं ने उत्साह के साथ भाग लिया। ग्रामीण सबसे पहले उदपाल्टा गांव के पंचायती आंगन में एकत्र हुए। इसके बाद ढोल-नगाड़ों और रणसिंघे की गूंज के बीच पारंपरिक वेशभूषा में नाचते-गाते हुए क्याणी नामक स्थल की ओर रवाना हुए। यहां पहुंचने के बाद पारंपरिक गागली युद्ध आयोजित किया गया। इस दौरान ग्रामीणों ने अरबी के पत्तों और डंठलों से एक-दूसरे पर प्रतीकात्मक प्रहार किए। इस आयोजन में किसी को हराना या जीत हासिल करना मकसद नहीं होता, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक मान्यताओं और सामूहिक प्रायश्चित की परंपरा का हिस्सा है। कार्यक्रम के समापन पर गांव के पंचायती आंगन में पुरुषों और महिलाओं ने पारंपरिक हारूल और तांदी नृत्य प्रस्तुत किया। लोकगीतों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के बीच पूरा माहौल सांस्कृतिक रंग में रंगा नजर आया।
दो बहनों की दुखद घटना से जुड़ी है परंपरा
खत के सदर स्याणा राजेंद्र सिंह राय ने गागली युद्ध के पीछे प्रचलित ऐतिहासिक मान्यता के बारे में जानकारी दी। उनके अनुसार, इस परंपरा का संबंध रानी और मुन्नी नाम की दो बहनों से जुड़ी एक दुखद घटना से है। मान्यता के मुताबिक, दोनों बहनें गांव से कुछ दूरी पर स्थित क्याणी के कुएं में पानी भरने गई थीं। इसी दौरान रानी का पैर फिसल गया और वह कुएं में गिर गई। मुन्नी जब घर पहुंचकर परिजनों को घटना के बारे में बताने गई, तो उस पर ही अपनी बहन को कुएं में धक्का देने का आरोप लगा दिया गया। इस आरोप से आहत मुन्नी ने भी कुएं में छलांग लगा दी, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। बाद में जब परिजनों और ग्रामीणों को वास्तविक घटना का पता चला, तो उन्हें अपने आरोपों पर पछतावा हुआ। स्थानीय परंपरा के अनुसार, इसी घटना की स्मृति और प्रायश्चित के प्रतीक के रूप में पाइंता पर्व पर गागली युद्ध की शुरुआत हुई।
घास की मूर्तियों की पूजा से शुरू होती है परंपरा
पाइंता पर्व से दो दिन पहले रानी और मुन्नी की घास से बनी प्रतीकात्मक मूर्तियां तैयार की जाती हैं और उनकी पूजा-अर्चना होती है। पर्व के दिन इन मूर्तियों को क्याणी स्थित उसी कुएं तक ले जाकर विसर्जित करने की परंपरा निभाई जाती है। उदपाल्टा और कुरौली के ग्रामीण हर वर्ष इस आयोजन के माध्यम से पुरानी घटना को याद करते हैं। यह परंपरा क्षेत्र की लोक आस्था के साथ-साथ गलतफहमी में किसी पर आरोप लगाने के दुष्परिणाम और आपसी विश्वास के महत्व को भी रेखांकित करती है। जौनसार-बावर का पाइंता पर्व इस बात का उदाहरण है कि किस तरह स्थानीय समाज अपनी परंपराओं के जरिए इतिहास, लोकविश्वास और सामुदायिक एकता को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रहा है।

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