August 8, 2026

उत्तराखंड में नई मजदूरी व्यवस्था लागू, 7 तारीख तक वेतन देना अनिवार्य..

उत्तराखंड में नई मजदूरी व्यवस्था लागू, 7 तारीख तक वेतन देना अनिवार्य..

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड में संगठित और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए सरकार ने दो अहम नियमावलियों को मंजूरी दे दी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में 7 अगस्त को हुई कैबिनेट बैठक में उत्तराखंड मजदूरी संहिता नियमावली-2026 और उत्तराखंड औद्योगिक संबंध नियमावली-2026 को स्वीकृति दी गई। नई व्यवस्था का उद्देश्य श्रमिकों को समय पर वेतन, समान पारिश्रमिक और बेहतर कानूनी संरक्षण उपलब्ध कराने के साथ औद्योगिक विवादों के समाधान की प्रक्रिया को सरल बनाना है।

हर महीने 7 तारीख तक वेतन भुगतान जरूरी

नई मजदूरी संहिता नियमावली में वेतन भुगतान की समयसीमा को लेकर स्पष्ट प्रावधान किया गया है। अब श्रमिकों को हर महीने की 7 तारीख तक मजदूरी का भुगतान करना अनिवार्य होगा। इससे खासतौर पर निर्माण क्षेत्र, फैक्ट्रियों और ठेका व्यवस्था में काम करने वाले श्रमिकों को राहत मिलने की उम्मीद है। मजदूरी के भुगतान में पारदर्शिता लाने के लिए डिजिटल माध्यम को भी बढ़ावा दिया गया है। इससे भुगतान का रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा और वेतन में कटौती, देरी या भुगतान को लेकर होने वाले विवादों को कम करने में मदद मिलेगी।नियमावली में निर्धारित कार्य अवधि से अतिरिक्त काम करने वाले श्रमिकों के लिए भी स्पष्ट व्यवस्था की गई है। ओवरटाइम करने पर उन्हें सामान्य मजदूरी की दोगुनी दर से भुगतान किया जाएगा। इसके साथ ही न्यूनतम मजदूरी से जुड़े प्रावधानों को भी नियमावली में शामिल किया गया है। समान काम के लिए महिला और पुरुष श्रमिकों को समान वेतन देने पर विशेष जोर दिया गया है। लैंगिक आधार पर मजदूरी में अंतर को खत्म करने का प्रावधान नई व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

शिकायतों के निस्तारण की होगी आसान व्यवस्था

श्रमिकों की शिकायतों और मजदूरी से जुड़े दावों के निपटारे के लिए प्रक्रिया को सरल बनाने की कोशिश की गई है। सरकार का उद्देश्य है कि कामगारों को अपनी शिकायत के समाधान के लिए लंबी कानूनी प्रक्रिया में न उलझना पड़े और मामलों का निस्तारण निर्धारित व्यवस्था के तहत जल्द हो।कैबिनेट ने उत्तराखंड औद्योगिक संबंध नियमावली-2026 को भी मंजूरी दी है। इसके तहत नियोक्ता और श्रमिकों के बीच विवादों को बातचीत, मध्यस्थता और सुलह के माध्यम से सुलझाने की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित किया जाएगा। सुलह अधिकारियों की नियुक्ति, जांच और मामलों के निपटारे से जुड़ी प्रक्रिया के लिए नियम तय किए गए हैं। इससे लंबे समय तक लंबित रहने वाले औद्योगिक विवादों को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है। इसके साथ ही कार्य समितियों के गठन, ट्रेड यूनियनों के पंजीकरण और उनकी मान्यता से संबंधित प्रक्रिया को भी स्पष्ट किया गया है। यूनियनों और प्रबंधन के बीच संवाद के लिए आवश्यक मानक निर्धारित किए गए हैं।नई नियमावली के तहत जिन प्रतिष्ठानों में 20 या उससे अधिक कर्मकार कार्यरत हैं, वहां शिकायत निवारण समिति के गठन और सदस्यों के चयन की प्रक्रिया स्पष्ट की गई है। इसका उद्देश्य छोटी-छोटी समस्याओं का समाधान संस्थान के स्तर पर ही करना है। हड़ताल और तालाबंदी को लेकर भी नोटिस की प्रक्रिया निर्धारित की गई है। बिना पूर्व सूचना के अचानक हड़ताल या तालाबंदी की स्थिति से होने वाले उत्पादन नुकसान और श्रमिकों की आय पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करने की कोशिश की गई है।

नियमावली में छंटनी से प्रभावित श्रमिकों के लिए भी प्रावधान किए गए हैं। उन्हें भविष्य में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की व्यवस्था के साथ श्रमिक री-स्किलिंग फंड से संबंधित प्रावधान शामिल किया गया है।इसका उद्देश्य नौकरी गंवाने वाले श्रमिकों को नए कौशल का प्रशिक्षण देकर दोबारा रोजगार के लिए तैयार करना है। सरकार की ओर से इसे श्रमिकों की रोजगार क्षमता बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। उत्तराखंड में निर्माण, होटल-पर्यटन, औद्योगिक इकाइयों और अन्य असंगठित क्षेत्रों में बड़ी संख्या में श्रमिक कार्यरत हैं। इन क्षेत्रों में प्रवासी कामगारों की भी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। ऐसे में समयबद्ध वेतन भुगतान, डिजिटल भुगतान का रिकॉर्ड, समान काम के लिए समान वेतन और विवादों के त्वरित निपटारे जैसे प्रावधान श्रमिकों के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। सरकार का कहना है कि दोनों नियमावलियों के लागू होने से श्रम कानूनों की प्रक्रिया अधिक स्पष्ट और सरल होगी। साथ ही कामगारों के अधिकारों की सुरक्षा और नियोक्ताओं के साथ बेहतर औद्योगिक संबंध स्थापित करने में भी मदद मिलेगी।